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अपच रोकने के लिए आंतों को करें डिटॉक्स





 ईशा


त्योहार और शादियों के मौसम में अक्सर खाने-पीने में लापरवाही हो ही जाती है। नतीजा शरीर का वजन बढ़ जाता है। ऐसा संभव नहीं कि आप किसी की शादी में जाकर सिर्प सलाद ही खाएं। बल्कि थोड़ा-बहुत ऐसा खा ही लेते हैं जो सेहत के लिए अच्छा नहीं होता। अब समय है शरीर को डिटॉक्स करने का। अगर आप अपनी सेहत को लेकर थोड़े सजग हैं जो कुछ उपाय करने ही पड़ेंगे। इस समस्या में हर्बल मदद कर सकता है।

आंत में शरीर के विषैले तत्व और खाने के अपशिष्ट जमा होते हैं। त्रिफला पाउडर बेहद सामान्य तरीके से इन्हें शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है। यह आंतों को साफ कर उसे डिटॉक्स करता है। जब यह विषैले तत्व शरीर से निकल जाते हैं, तो वजन भी नियंत्रित रहता हैं। त्रिफला एसिडिटी जैसी परेशानी भी खत्म करता है। अक्सर शरीर में ज्यादा पानी जमा होने से आंखों में सूजन की शिकायत भी हो जाती है। यह पाउडर शरीर में पानी की मात्रा नियंत्रित करता है और सूजन भी दूर करता है। शरीर से अतिरिक्त चर्बी हटाने और एसिडिटी कंट्रोल करने में भी मदद करता है। एसिडिटी त्वचा को बेजान करती है।

जो लोग कॉकटेल ज्यादा लेते हैं, उनके लिए त्रिफला वरदान है। यह लिवर को भी डिटॉक्स करता है। रात में सोने से पहले शरीर को डिटॉक्स करने के लिए गुनगुने पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला पाउडर ले सकते हैं। गेहूं के छिलके को अक्सर लोग फेंक देते हैं, पर यह फाइबर और विटामिन युक्त होता है। गेहूं का छिलका शरीर में मौजूद वसा को सोख लेता है जिससे शरीर में वसा जमा नहीं हो पाता और वजन नियंत्रित रहता है। गेहूं के छिलके को गर्म कर दूध में मिलाकर लेने से वजन कम होता है।

अपच जैसी समस्या से हम अक्सर रूबरू होते हैं ऐसे में पपीता और अनानास दो ऐसे फल हैं जो भोजन को पचाने में मदद करते हैं। पपीता जादुई फल है जिसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स की मात्रा बेहद कम होती है जिस कारण यह डायबिटिज, आर्थराइटिस और मोटापे के मरीजों के लिए भी मददगार होता है। इसमें पैपेन नामक एंजाइम खाना पचाने में मदद करता है, जिससे पेट में जहरीले तत्व नहीं बन पाते। इससे आंतें हेल्दी ओर साफ रहती हैं और शरीर का वजन नहीं बढ़ता। रात के खाने से पहले पपीते और अनानास के कुछ टुकड़े गुनगने पानी के साथ खाने से पाचन ािढया ठीक रहती है।

सुबह उठते ही दो ग्लास गुनगुना पानी शरीर के लिए फायदेमंद होता है। ग्रीन टी साधारण चाय के मुकाबले शरीर के लिए फायदेमंद है। ग्रीन टी में कैटेचीन पोलीफिनॉल और गैलेट्स जैसे यौगिक मौजूद होते हैं, जो हमारे शरीर को डिटॉक्स करने और अतिरिक्त वसा हटाने में मदद करते हैं। खाने के साथ एक कप ग्रीन टी पाचन ािढया सही रखती है। यह लिवर को भी सही रखने में मददगार है। अक्सर भूख को शांत करने के लिए लोग स्नैक्स या फाइड फूड खा लेते हैं। इनसे वेट कम नहीं होता और एसिडिटी जैसी समस्या हमेशा बनी रहती है। डिनर से पहले कभी भी तले हुए स्नैक्स न खाएं। फल हमेशा से शरीर के लिए फायदेमंद है। इसमें मौजूद विटामिन सी लिवर को खाना पचाने में मदद करता हैं। इसलिए खाने के साथ एक बाउल पूट-सलाद का होना जरूरी है।

हरड़ या हरीतकी का वृक्ष 60 से 80 फुट ऊंचा होता है। प्रधानत यह निचले हिमालय क्षेत्र में रावी तट से बंगाल आसाम तक लगभग पांच हजार फुट की ऊंचाई तक पाया जाता है। इसकी छाल गहरे भूरे रंग की होती है तथा पत्तों का आकार वासा के पत्तों जैसा होता है। सर्दियों में इसमें फल आते हैं जिनका भंडारण जनवरी से अप्रैल के बीच किया जाता है।

मौटे तौर पर हरड़ के दो प्रकार हैं? बड़ी हरड़ और छोटी हरड़। बड़ी हरड़ में सख्त गुठली होती है जबकि छोटी हरड़ में कोई गुठली नहीं होती। वास्तव में वे फल जो गुठली पैदा होने से पहले ही तोड़कर सुखा लिए जाते हैं उन्हें ही छोटी हरड़ की श्रेणी में रखा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार छोटी हरड़ का प्रयोग निरापद होता है क्योंकि आंतों पर इसका प्रभाव सौम्य होता है। वनस्पति शास्त्र के अनुसार हरड़ के तीन अन्य भेद हो सकते हैं। पक्वफल, अर्धपक्व फल तथा पीली हरड़। छोटी हरड़ को ही अधिपक्व फल कहते हैं जबकि बड़ी हरड़ को पक्वफल कहते हैं। पीली हरड़ का गूदा काफी मोटा तथा स्वाद कसैला होता है फलों के स्वरूप, उत्तत्ति स्थान तथा प्रयोग के आधार पर हरड़ के कई अन्य भेद भी किए जा सकते हैं। नाम कोई भी हो चिकित्सकीय प्रयोगों के लिए डेढ़ तोले से अधिक भार वाली, बिना छेद वाली छोटी गुठली तथा बड़े खोल वाली हरड़ ही प्रयोग की जाती है।

टेनिक अम्ल, गलिक अम्ल, चेबूलीनिक अम्ल जैसे ऐस्ट्रिन्जेन्ट पदार्थ तथा एन्थ्राक्वीनिन जैसे रोचक पदार्थ हरड़ के रासायनिक संगठन का बड़ा हिस्सा हैं। इसके अतिरिक्त इसमें जल तथा अन्य अघुलनशील पदार्थ भी होते हैं। इसमें 18 प्रकार के अमीनो अम्ल मुक्तावस्था में पाए जाते हैं।

बवासीर, सभी उदर रोगों, संग्रहणी आदि रोगों में हरड़ बहुत लाभकारी होती है। आंतों की नियमित सफाई के लिए नियमित रूप से हरड़ का प्रयोग लाभकारी है। लंबे समय से चली आ रही पेचिश तथा दस्त आदि से छुटकारा पाने के लिए हरड़ का प्रयोग किया जाता है। सभी प्रकार के उदरस्थ कृमियों को नष्ट करने में भी हरड़ बहुत प्रभावकारी होती है।

अतिसार में हरड़ विशेष रूप से लाभकारी है। यह आंतों को संकुचित कर रक्तस्राव को कम करती हैं वास्तव में यही रक्तस्राव अतिसार के रोगी को कमजोर बना देता है। हरड़ एक अच्छी जीवाणुरोधी भी होती है। अपने जीवाणुनाशी गुण के कारण ही हरड़ के एनिमा से अल्सरेरिक कोलाइटिस जैसे रोग भी ठीक हो जाते हैं।

इन सभी रोगों के उपचार के लिए हरड़ के चूर्ण की तीन से चार ग्राम मात्रा का दिन में दो तीन बार सेवन करना चाहिए। कब्ज के इलाज के लिए हरड़ को पीसकर पाउडर बनाकर या घी में सेकी हुई हरड़ की डेढ़ से तीन ग्राम मात्रा में शहद या सैंधे नमक में मिलाकर देना चाहिए। अतिसार होने पर हरड़ गर्म पानी में उबालकर प्रयोग की जाती है जबकि संग्रहणी में हरड़ चूर्ण को गर्म जल के साथ दिया जा सकता है।

हरड़ का चूर्ण, गोमूत्र तथा गुड़ मिलाकर रात भर रखने और सुबह यह मिश्रण रोगी को पीने के लिए दें इससे बवासीर तथा खूनी पेचिश आदि बिल्कुल ठीक हो जाते हैं।

इसके अलावा इन रोगों के उपचार के लिए हरड़ का चूर्ण दही या मट्ठे के साथ भी दिया जा सकता है। लीवर, स्पलीन बढ़ने तथा उदरस्थ कृमि आदि रोगों की इलाज के लिए लगभग दो सप्ताह तक लगभग तीन ग्राम हरड़ के चूर्ण का सेवन करना चाहिए। हरड़ त्रिदोष नाशक है परन्तु फिर भी इसे विशेष रूप से वात शामक माना जाता है।

 यह दुर्बल नाडियों को मजबूत बनाती है तथा कोषीय तथा अंर्तकोषीय किसी भी प्रकार के शोध निवारण में प्रमुख भूमिका निभाती है। हालांकि हरड़ हमारे लिए बहुत उपयोगी है परन्तु फिर भी कमजोर शरीर वाले व्यक्ति, अवसादग्रस्त व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्रियों को इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

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