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मन्दिर समितियों को; आवास, स्वास्थ्य, शैक्षिक कार्यों से, जुड़ना चाहिए


.सं. संजीव कुमार बड़ोनी स्वतंत्र पत्रकारः
-मेलः- Sanjeevbadoni 12@yahoo.com

abslm 04/3/ 2015
भारत भर में, विभिन्न प्रदेशों के अन्तर्गत; भिन्न-भिन्न प्रकार की मन्दिर समितियों का गठन होता है। भारत के अट्ठाईस प्रदेशों में से, कुछ एक के अन्दर; क्षेत्रीय भाषाएं भी बोली तथा पढ़ाई जाती हैं। वर्तमान में, भारत के बुनियादी विकास के लिए, यह बड़ा ही महत्वपूर्ण कदम हो सकता है कि सम्पूर्ण प्रकार की मन्दिर समितियाँ, अलग-अलग प्रकार की शैक्षिक
गतिविधियों से जुड़ सकें। उदाहरणतया, कुछ प्रकार की मन्दिर समितियाँ अनाथ और गरीब बच्चों को, मात्र अक्षर ज्ञान ही करा सकेंगी। ये, शिक्षार्थी वही महिलाएं होंगी जो कि किसी किसी प्रकार की समस्या से, पीड़ित रह सकती हैं। मन्दिर समितियाँ अपने शैक्षिक कार्यक्रम, दिन-रात दोनों शिफ्टों में, चला सकेंगी। अपने सम्पूर्ण स्टॉफ का वेतन खर्च, मन्दिर समितियाँ केवल अपने ही, बलबूते पर, बिना किसी सरकारी अनुदान के, वहन कर सकेंगी।अन्य भाँती-भाँती की, मन्दिर समितियाँ, सभी प्रकारीय भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं को, पढ़ाने की कक्षाएं संचालित कर सकेंगी। कुछ बड़ी-बड़ी मन्दिर समितियाँ, वैज्ञानिक शोध के कार्यक्रम चला सकेंगी। जबकि, अन्य मन्दिर समितियाँ जन-संचार के पाठ्यक्रमों को, संचालित करने के अतिरिक्त, अत्याधुनिक पुस्तकालय (लाईब्रेरी) सेवाओं का,क्रियान्यन कर सकेंगी। कुछ मन्दिर समितियाँ, छोटे-छोटे रोजगारपरक व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को, भूर्तरुप में, जरुरतमन्द शिक्षार्थियों तक पहुँचा सकेंगी।
इससे हटकर, दूसरी मन्दिर समितियाँ, कम्प्यूटर पाठ्यक्रम भी, शिक्षण में सम्मिलित कर सकेंगी। पूरे भारत में, जगह-जगह पर दुःखी, अनाथ, बेसहारा अर्द्धविक्षिप्त, विक्षिप्त, लावारिस, गूँगे, बहरे ईत्यादी नाना-प्रकार के पुरुष-महिलायें घूमते-फिरते देखे जा सकते हैं। मन्दिर समितियों को, उनके आवास के लिए, उचित स्थान की व्यवस्था करनी चाहिए। उनकी देख-रेख हेतु, समुचित धमार्थ स्टाफ का भी बन्दोबस्त रहना चाहिए। यह अज्ञात कारण हो सकता है कि जाने किन अदृश्य परिस्थितियों के कारण, कोई भला-चंगा व्यक्ति पागल घोषित हो सका हो। कभी-कभी सम्पित्तयों को हथियाने के लिए भी, किसी भी अमुक महिला-पुरुष को पागल करार होने की आपराधिक साजिश रची जा सकती है।
इसके अतिरिक्त रंजिशन भी, कानून की नजरों में धूल झोंककर तथा कुछ अल्प भ्रष्ट चिकित्सकों की सहायता से, किसी अनाम व्यक्ति को, ज़बरदस्ती पागलखाने में, भर्ती कराया जा सकता है। उपरोक्त सभी विपरित परिस्थितियों को भुगतने के कारण ही; कोई अनजान महिला-पुरुष अपना मानसिक संतुलन खो सकते है; तब उसके पश्चात सचमुच में पागल हो सकते है। इसलिए, मन्दिर समितियों को चाहिए कि उनके द्वारा, ऐसे दुःखी तथा सताये हुए व्यक्तियों के लिए देशभर में, आवास और स्वास्थ्य सुविधाएं चौबीसों घंटे उपलब्ध रहनी चाहिए। मन्दिर समितियों को, अपने जन-कल्याण के कार्यों में, लोगों के अन्दर विश्वभर में, संवेदना (सेन्सिटीविटी) उत्पन्न होने के, कार्यक्रम अवश्य चलाने चाहिए। मनुष्यों को, अपने दिमाग का धनात्मक उपयोग करना चाहिए।
मन्दिर समितियों द्वारा, चलाए जाने वाले शैक्षिक कार्यक्रमों में, धर्म का मानवता के प्रति, सच्चे अर्थपूर्ण कर्तव्य में, यह भी पढ़ाया जाना चाहिए कि इंसानों और राक्षसी व्यवहार में, क्या-क्या जमीनी अन्तर हैं। थोड़ी सी, विशिष्ट मन्दिर समितियाँ देशभर में, अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में, कार्य कर सकती हैं। उन मन्दिर समितियों को, अपने-अपने स्तर पर, अनुसंधान और विकास के विशिष्ट कार्य करने चाहिए चन्द ऐसी मन्दिर समितियाँ भी, होनी चाहिए जो कि स्वतंत्र रुप से अनुसंधान कार्यों में लगे हुए, व्यक्तियों का रिकार्ड अपने पास सुरक्षित रख सकें। स्वतंत्र रुप से अनुसंधान कार्य करने वाले व्यक्ति, दो प्रकार से शोध कार्यों में, लगे हुए रह सकते हैं। पहले प्रकार के व्यक्ति वे हो सकते है, जिनका कि अपना स्वतंत्र शोध कार्य, किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हो सकता है। जबकि, दूसरे प्रकार के व्यक्ति वे हो सकते हैं जो कि राज्य अथवा केन्द्रीय, सरकारों की, किसी भी मान्यता प्राप्त शोध संस्थाओं को, अपना हस्त लिखित (मनुस्क्रीप्ट) शोध पत्र, प्रस्तुत कर सकते है। वह शोध पत्र हिन्दी, अंग्रेजी अथवा किसी भी, अन्य क्षेत्रीय भाषा में हो सकता है। भाँती-भाँती के, स्वतंत्र शोध कार्योँ में लगे हुए व्यक्तियों के अनुसंधान का, चोरी हो सकने के कई कारण हो सकते हैं। उदाहरणतया, बुद्धिमान परन्तु चालाक, बेईमान व्यक्तियों के बीच, खुल्लम-खुल्ला डिस्कसन करने से भी, इसके चोरी होने की, संभावनाएं प्रकाशवान् हो सकती हैं। अनद्दपे, शोध लेख के चोरी हो सकने की, प्रबल आशंकाएं हो सकती हैं।
अतः कुछ मन्दिर समितियों को देशभर में, किन्ही भी अज्ञात व्यक्तियों की, बौद्धिक सम्पदा (इंटैलैक्युअल प्रोपर्टी) को बचाए रखने की दिशा में, कार्य करना चाहिए। वे सभी, मन्दिर समितियाँ भारतभर में स्वतंत्र अनुसंधानीयों के, बौद्धिक सम्पदा अधिकारों (इंटैलैक्युअल प्रोपर्टी राईट्स) को, बचाए तथा बचाए रखने की दिशा में, कानूनी चेतना जागृत कर सकती हैं। कुछ अन्य मन्दिर समितियाँ, देशभर में राष्ट्रवासियों को, शिक्षा तथा ज्ञान का अन्तर, समझा सकती हैँ। कोई भी अमुक व्यक्ति शैक्षणिक स्तर पर, पी.एच.डी. का उपाधी धारक हो सकता हैं, किन्तु यह जरुरी नहीं कि वही व्यक्ति ज्ञान के क्षेत्र में भी, उत्कृष्ट ही हो सके। हाँ, कुछ विरले व्यक्तियों में, शिक्षा का चरम बिन्दु, उनके ज्ञान की सर्वोच्च सीमा से, मेल खा सकता है। परन्तु ऐसे व्यक्तियों की प्रतिशत मात्रा, अधिक नीचे हो सकती है। इसलिए, अल्प मन्दिर समितियों को, ऐसे प्रयास भी करने चाहिएं कि वे, देशवासियों को शिक्षा तथा ज्ञान के, दो अलग-अलग रास्तों की मौलिक भिन्नता से, परिचित करा सकें। कभी-कभी, कुछ-कुछ अनाम तथा अज्ञात कुशार-बुद्धि के, सुदामा पंडितों को, पढ़ने-लिखने के पर्याप्त संसाधन नहीं मिल सकते हैं; जिसके चलते हुए, विपरित परिस्थितियों के कारण, उनको छोटे- मोटे व्यवसाय करने पड़ सकते हैं। उन सच्चे कारणों को, ध्यान में रखते हुए, मन्दिर समितियों को, ऐसे भी व्यक्तियों का, चुन-चुनकर संज्ञान लेना चाहिए। जिस व्यवस्था के अमल में, जाने से, उन बुद्धिमान सुदामा पंडितों की, शिक्षा-दीक्षा को दर-किनार कर, मात्र उनके बुनियादी ज्ञान को प्राथमिकता में, रखा जा सकता है।
इस विशिष्ट उपाय के फलीभूत हो जाने से, वे सभी ज्ञानवान् सुदामा पंड़ित विभिन्न क्षेत्रों में, अपने जमीनी ज्ञान से, देश के लिए कोई चमत्कारी कार्य कर सकते हैं। पहाड़ी
राज्यों के, ठेठ टूरस्थ अँचलों में, मन्दिर समितियाँ, आवास और स्वास्थ्य सेवाओं पर, अपना विशिष्ट ध्यान केन्द्रीय कर सकती हैँ। पहाड़ी राज्यों के दुर्गम स्थानों पर, जहाँ-जहाँ स्वास्थ्य तथा आवास की सुविधाएँ; ये सभी मन्दिर समितियाँ उपलब्ध करवा सकती हैं; वहाँ-वहाँ विकास तथा निर्माण के कार्यों में, आपदा-प्रशमन (डिजास्टर मिटिगेशन) का विशेष ध्यान, अवश्य रखा जाना चाहिए। प्रतिपालनीय विकास में, पहाड़ी अंचलो से मलवा निकासी के, दूरदर्शी तथा सर्वोत्तम वैज्ञानिक एवं टेक्नीकल उपाय होने चाहिएं। इसके पश्चात, उन स्थानों पर, स्वास्थ्य तथा आवास सुविधाए, किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं में, अपने ही स्थान पर सुरक्षित ही; टिकी रह सकेंगी। मन्दिर समितियों द्वारा, दी जाने वाली, आवासीय एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं में, जन सेवा सर्वोपरी रह सकेंगी।

पहाड़ी राज्यो के, सुन्दरवर्ती अन्तस्थ स्थानों पर, मन्दिर समितियों द्वारा, दी जाने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं में; अत्याधुनिक चिकित्सकीय फैसिलिटीज़ भी, उपलब्ध रह सकेंगी।

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