abslm 29/05/2022
➡️ नकारात्मक प्रवृति की वजह से ही बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृति
▶️ आत्मघुटन और तनावग्रस्त होने की मूल वजह है नकारात्मकता
▶️ सभी संसाधनों से संपन्न होने के बावजूद भी नकारात्मक प्रवृति जीवन को बना देता है असहज और असंतुलित
दार्शनिक शंभू
मनुष्य को जन्म से ही प्रतिस्पर्धा और नकारात्मक विचारों का सामना करना पड़ता है।नकारात्मक स्थितियों से सामना करने की शक्ति के अभाव से ही आत्मघुटन और तनावग्रस्त व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है।परिवार और समाज में पति,पत्नी,भाई,बहन,रिश्तेदार और सहकर्मियों की आदत और व्यवहार से जब नकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगता है तभी व्यक्ति कुंठित और तनावग्रस्त होकर बीमार होने लगा है और असमय ही मृत्यु को प्राप्त कर रहा है।इसी वजह से सुबह सुबह खुद को सजाने संवारने वाला मनुष्य दिन ढलते ही आत्महत्या कर जीवनलीला समाप्त कर लेता है। आज हर क्षण,हर पल हमारे इर्द गिर्द नकारात्मक व्यक्तियों और विचारों का बोलबाला है।देश की सीमाओं पर सुरक्षा में लगे सैनिक हथियारों से उतना छलनी नहीं हो रहे हैं जितना हम आसपास के लोगों के नकारात्मक विचारों से छलनी हो रहे हैं।किसी के हाथ में खंजर है,हथियार है,विस्फोटक वस्तु है तो वह किसी खास व्यक्ति या स्थान को ही नाश कर सकता है लेकिन यदि सोच विचार में ही ईर्ष्या,द्वेष,छल,कपट,क्रोध और कटु बोलने की आदत से वातावरण विषाक्त हो जाए तो इससे जीवन का ही सर्वनाश हो जाता है।सभी संसाधनों यथा पद, पैसा,प्रतिष्ठा और प्रभाव से संपन्न होने के बावजूद यदि नकारात्मक शक्तियों से जूझने की प्रवृति विकसित नहीं होती है तो मानव जीवन का हर क्षण असंतुलित और असहज ही रहेगा।नकारात्मक शक्तियों से तालमेल बिठाने का कौशल विकसित करने के बाद ही मानव जीवन का वास्तविक आनंद लिया जा सकता है।पहले राक्षसों की योनि हुआ करती थी अब लोगों का विचार ही राक्षस के समतुल्य हो गया है।घर,परिवार और पड़ोस में नकारात्मकता का वास हो गया है।आस पास के लोगों की प्रवृति भी प्रकृति के समीप नहीं है और न ही उनका विचार सकारात्मक है तो प्रतिस्पर्धा के इस भीषण माहौल में आत्मिक शांति की कल्पना कैसे की जा सकती है?सतयुग में क्षमा करने वाला ,त्रेता में दान करने वाला,द्वापर में यज्ञ करने वाला जबकि कलयुग में सहने वाला ही वीर होता है क्योंकि कदम कदम पर नकारात्मक लोगों के विचारों पर प्रतिक्रिया देते रहने से अच्छा सह लेना ही उचित है।
इन वजहों से उत्पन्न होता है नकारात्मक विचार
आज के दौर में गलाकाट प्रतिस्पर्धा और भावनात्मक तथा आत्मीय प्रेम के अभाव से ही नकारात्मक शक्ति की उत्पत्ति होती है।लोगों की प्रवृति और प्रकृति में दया,क्षमा,करुणा और त्याग का घोर अभाव है।आत्मीयता पर औपचारिकता हावी है।अगर मनुष्य के भीतर ही औपचारिकता पल रहा हो तो भला आत्मीयता बाहर कैसे परिलक्षित होगा?औपचारिक प्रेम समय समय पर अहंकार को दिखाता है,लोभ में फंसाता है,ईर्ष्या और घृणा को दर्शाता है और वह मतलबी मापदंड पर ही खरा उतरता है।वहीं आत्मीय प्रेम में कोई शर्त नहीं होती है और ऐसा प्रेम करने वाला सहजता और सरलता का धनी होता है।जिस व्यक्ति में इन सद्गुणों का अभाव होगा,वह निश्चित रूप से नकारात्मकता से भरा होगा और खुद के साथ साथ परिवेश को भी कुप्रभावित करेगा।क्रोध,लोभ,मोह,छल,कपट,ईर्ष्या,द्वेष जैसे कूड़ा करकट से भरे हुए मनुष्य में नकारातमकता नहीं तो और क्या आएगी?इन दुर्गुणों की सफाई अध्यात्म की शरण में जाने के बाद ही हो सकती है।आध्यात्मिक व्यक्ति ही प्राकृतिक रूप से सकारात्मक होगा और दूसरों को दोषारोपित नहीं करेगा बल्कि खुद की कमियों को सुधारने के लिए वह चिंतनशील और मननशील होगा।
नकारात्मक प्रवृति अपनाने से होता है यह नुकसान
यह विचारणीय प्रश्न है कि तमाम तरह की संसाधनों से संपन्न होने के बाद भी लोगों का व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक संबंध तार तार क्यों हो रहे हैं?इसका एकमात्र उत्तर यह है कि जब तक भावात्मक और आत्मीय प्रेम नहीं होगा तब तक आत्मिक प्रसन्नता और आत्मसंतुष्टि प्राप्त नहीं हो सकती है जिसके मूल में नकारात्मक विचार ही है।इसका सबसे बड़ा नुकसान शांति और चैन का छीन जाना है जो बाजार से खरीदी नहीं जा सकती है बल्कि आत्मसमीक्षा और चिंतनशील होकर ही प्राप्त की जा सकती है।शरीर जब बीमार होता है तो वह इलाज से या तो ठीक होता है या शरीर का नाश होता है लेकिन यदि विचार बीमार होता है तो यह न केवल वातावरण को विषाक्त करता है बल्कि नाश का मार्ग प्रशस्त करता है।आज के प्रतिस्पर्धी माहौल में जीने से ज्यादा मरने की होड़ लगी हुई है।छात्र छात्राओं का नामांकन नहीं हो तो आत्महत्या,मनोवांछित नौकरी नहीं मिली तो आत्महत्या, व्यवसाय में असफल हुए तो आत्महत्या,रिश्तों में हल्की सी भी खटास आई तो आत्महत्या.......इस प्रकार नकारात्मकता के कुप्रभावों और दुष्परिणामों को इन उदाहरणों से समझ कर यह सीखा जा सकता है कि नकारात्मक विचारों पर विजय प्राप्त करने के बाद ही जीवन सफल और सुखद हो सकता है।
नकारात्मक विचारों से दूर रहने का कौशल सीखना है जरूरी
यह तो तय है कि हम अपने इर्द गिर्द की नकारात्मक शक्तियों और विचारों का उन्मूलन नहीं कर सकते हैं लेकिन खुद को इससे बचने का कौशल तो निर्मित जरूर सकते हैं।खुद को सबल और सक्षम बनाकर इसके प्रभाव को कम जरूर कर सकते हैं।जब तक दोषारोपण की प्रवृति रहेगी तब तक नकारात्मक विचार को रोका नहीं जा सकता है।नकारात्मक विचारों ने प्रकृति की व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर दिया है जिसका दुष्प्रभाव जगजाहिर है।भौतिकता से वशीभूत होता जा रहा आज का मनुष्य न तो क्षमा मांगना जानता है और न ही क्षमा देना जानता है जिसका मूल कारण प्रेम का अभाव है।सही और सच्चा प्रेम करने वाला व्यक्ति ही क्षमा कर सकता है और क्षमा मांग सकता है।आत्मीय प्रेम एहसास कम और महसूस ज्यादा कराता है।संसाधनों की शक्ति में अगर प्रेम और संवेदना नहीं है तो विध्वंस का मार्ग ही प्रशस्त होता है।मनुष्य विभिन्न जगहों की शारीरिक यात्रा कर कुछ क्षणों के लिए भले ही आनंदित हो जाता है लेकिन जीवन लक्ष्य को ध्यान में रखकर विचार की यात्रा करने वाला मनुष्य संसाधनों के अभाव में भी जीवन भर प्रसन्नचित और सुखी रहता है।
किसी दार्शनिक ने सही कहा है कि
तन का प्रेम वासना है।
मन का प्रेम भावना है।
आत्मा का प्रेम साधना है।
और
सेवा और त्याग का प्रेम ही आराधना है।
कुल मिलाकर हम लोगों की प्रवृति और आदतों को तो नहीं बदल सकते हैं लेकिन सेवा,दया,करुणा,सकारात्मकता और सहनशीलता को बढ़ाकर इन दुर्गुणों-अवगुणों के विरुद्ध अपनी प्रतिरोधात्मक क्षमता का कौशल विकसित कर परिस्थितियों से तालमेल बिठाने की कला जानने वाले व्यक्ति ही नकारात्मकता पर विजय जरूर प्राप्त कर सकते हैं।


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