ABSLM 7/7/2023 एस• के• मित्तल
वे लिखते हैं कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु अपने, गोविंद दियो बताए। यानी गुरु और गोविंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए-गुरु को या गोविंद को। फिर अगली पंक्ति में उसका जवाब देते हैं कि ऐसी स्थिति हो तो गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उनके ज्ञान से ही आपको गोविंद के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। स्वामी निगमबोध तीर्थ ने कहा कि गुरु के बिना ज्ञान का मिलना असंभव है। जब तक गुरु की कृपा प्राप्त नहीं होती, तब तक कोई भी मनुष्य अज्ञान रूपी अधंकार में भटकता हुआ माया मोह के बंधनों में बंधा रहता है, उसे मोक्ष (मोष) नहीं मिलता। गुरु के बिना उसे सत्य और असत्य के भेद का पता नहीं चलता, उचित और अनुचित का ज्ञान नहीं होता। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि वे संतो-महात्माओं व गुरूओं की शरण में जाएं। उनकी शरण में जाने से ही मनुष्य का बेड़ा पार हो सकता है।
फोटो कैप्शन 5एसएफडीएम2.: वेदाचार्य दण्डीस्वामी निगमबोध तीर्थ महाराज।
.jpg)

No comments:
Post a Comment
निवेदन :- अगर आपको लगता है की ये लेख किसी के लिए उपयोगी हो सकता है तो आप निसंकोच इसे अपने मित्रो को प्रेषित कर सकते है