abslm 17/03/2022 एस• के• मित्तल
सफीदों,नगर के ऐतिहासिक महाभारतकालीन नागक्षेत्र सरोवर हाल में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए भागवत पीठाधीश्वर आचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत साक्षात भगवान का स्वरूप है इसीलिए श्रद्धापूर्वक इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस मौके पर समाजसेवी तीर्थराज गर्ग ने आचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज का माल्यार्पण करके अभिनंदन किया। आचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत के पठन एवं श्रवण से भोग और मोक्ष दोनों सुलभ हो जाते हैं। मन की शुद्धि के लिए इससे बड़ा कोई साधन नहीं है। सिंह की गर्जना सुनकर जैसे भेडि़ए भाग जाते हैं, वैसे ही भागवत के पाठ से कलियुग के समस्त दोष हो जाते हैं। इसके श्रवण मात्र से हरि हृदय में आ विराजते हैं। भोग और मुक्ति के लिए तो एकमात्र भागवत शास्त्र ही पर्याप्त है। हजारों अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ का फल इस कथा के श्रवण से मिलता है। फल की दृष्टि से भागवत की समानता गंगा, गया, काशी, पुष्कर या प्रयाग कोई भी तीर्थ नहीं कर सकता। सम्मान के साथ सेवा का अवसर दिलाने में सहायक जनमानस में भागवत का विशिष्ट स्थान है। बहुत दिनों तक चित्तवृत्ति को वश में रखना तथा नियमों में बंधे रहना कठिन है, इसलिए भागवत के सप्ताह श्रवण की विधि उत्तम मानी गई है। भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण मास के शुभ मुहूर्त में कथा सप्ताह का आयोजन होना चाहिए। तथापि भागवत में स्पष्टत: कहा गया है कि इसके पठन-श्रवण के लिए दिनों का कोई नियम नहीं है। इसे कभी भी पढ़ा-सुना जा सकता है। मात्र एक, आधे या चौथाई श्लोक के अर्थ सहित नित्य पाठ से अभीष्ट फलों की प्राप्ति हो सकती है। जिस घर में नित्य भागवत कथा होती है, वह तीर्थरूप हो जाता है। केवल पठन-श्रवण ही पर्याप्त नहीं इसके साथ अर्थबोध, मनन, चिंतन, धारण और आचरण भी आवश्यक है।
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