नई दिल्ली। गरीबी के बारे में ताजा आंकड़ों पर चिंता व्यक्त करते हुये संसद की एक समिति ने सरकार से इस बारे में व्यापक अध्ययन करने के लिये राज्यों, केन्दीय विभागों और योजना आयोग को मिलाकर एक संयुक्त प्रणाली बनाने को कहा है।
वित्त पर ग"ित संसद की स्थायी समिति ने कल इस संबंध में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है समिति का मजबूती के साथ यह मानना है कि गरीबी की परिभाषा के बारे में केवल संबंधित विभागों को शामिल किये जाने से ही वांछित परिणाम मिल सकते हैं और इसके लिये संयुक्त प्रणाली .. इस काम को बखूबी कर सकती है। पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा के वरिष्" नेता यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली समिति ने यह सुझाव हाल ही में योजना आयोग की रिपोर्ट में दिये गये गरीबी की परिभाषा के नये अनुमान पर दिये हैं। योजना आयोग की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में वर्ष 2004..05 में जहां 37.2 प्रतिशत गरीब थे वहीं इनकी संख्या 2011..12 में घटकर 21.9 प्रतिशत रह गई। आयोग के अनुसार वर्ष 2011..12 में तेंदुलकर समिति के मानदंडों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा 816 रुपये प्रति व्यक्ति और शहरी क्षेत्रों में 1,000 रुपये प्रति व्यक्ति रही है।
इसका अर्थ यह हुआ कि शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन 33.33 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में 27.20 रुपये प्रतिदिन से अधिक वस्तु एवं सेवाओं का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। समिति ने इस बात को लेकर आश्चर्य जताया है कि योजना आयोग ने इस मामले में सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना को शामिल क्यों नहीं किया। आयोग को इस मामले में आगे बढ़कर ग्रामीण विकास, आवास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के साथ बेहतर समन्वय बि"ाते हुये देश में गरीबी के बारे में सही आकलन करना चाहिये।
समिति ने कहा है गरीबी के अनुमान और गरीबी रेखा से नीचे की परिवारों की पहचान में लंबे समय से जो समस्या चली आ रही है उसकी वजह योजना आयोग द्वारा इसके अनुमान में अलग मानदंड अपनाने और संबंधित दूसरे मंत्रालय द्वारा अलग लाइन अपनाने की वजह से है।
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