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भारतीय संस्कारों को अपनाकर रहें स्वस्थ





नई दिल्ली। वर्कशॉप का संचालन करते हुए हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया एवं एमटीएनएल परफैक्ट हेल्थ मेला के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल ने कहा कि भारत के सभी संस्कार और पर्व जो हमारे ऋषि मुनियों ने बनाए, उनसे व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।

कार्यशाला का अयोजन  फिक्की लेडीज ऑर्गनाइजेशन की अध्यक्ष श्रीमती मालविका राय द्वारा किया गया था और इसमें एनसीआर की 100 से अधिक वूमेन एंटरपीन्योर ने हिस्सा लिया।

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि पाचीन भारत में कई तरह की मेडिकल पैथीज की सुविधाएं नहीं थी। बीमारी से बचाव का एकमात्र उपाय ऋषि मुनियों के बताए तरीकों का पालन करना था और इन उपायों को हमने संस्कारों और पर्वों के रूप में मनाने के तौर पर बचाव के तरीके अपनाने शुरू कर दिए।

एक उदाहरण देते हुए डॉ. अग्रवाल ने  बताया कि संतोषी माता का व्रत रखने से मां बनने के समय वाली महिलाओं में इससे एनीमिया की कमी से बचती हैं साथ ही पोटीन व अन्य पौष्टिक चीजों की भरपाई गुड़ और चना खाने से होती है जिसमें आइरन होता है और इस तरह इस दौरान शरीर में होने वाली कमी की भरपाई हो जाती है।

रिवाजों के बारे में बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि माघ, वैशाख और कार्तिक माह में सूर्य स्नान करने का मतलब है कि व्यक्ति में विटामिन डी की कमी की भरपाई हो जाए।पाचीन काल में कोई भी व्यक्ति डायबिटीज, ब्लड पेशर, हार्ट अटैक या तोंद के मोटापे का शिकार नहीं होता था। ऋषि मुनि जानते थे कि इंसुलिन रेजिडेंस से बचने के लिए कार्बोहाइड्रेट वाले अनाज का सेवन हफ्ते में एक दिन नहीं करना है, जिसे हफ्ते मे एक व्रत के तौर पर मनाते थे।

ऋषि मुनि ये भी जानते थे कि चतुर्मास के महीने में शरीर और मन में ज्यादा नकारात्मकताएं आती हैं, इसलिए उन्होंने इसी दौरान अधिक त्योहारों को रखा है ताकि व्यक्ति तन मन की सफाई करे और अपने अहम पर काबू पाए।

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि कॉग्नीटिव बीहैवियर थेरेपी का सिद्धांत एलोपैथी में भगवद गीता से आया है और इसको एक्पोज़र थेरेपी के तौर पर माना है जो चौथा, तेरहवीं और बै"क रिवाजों के रूप में मौत के बाद मनाते हैं।

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