चौदह
नवंबर बाल दिवस
के रूप में
मनाने का औचित्य
यह है कि
पं. जवाहरलाल नेहरू
बच्चों को देश
का भविष्य मानते
थे। उनकी यह
अवधारणा सौ फीसदी
सत्य है, क्योंकि
आज जन्मा शिशु
भविष्य में राजनीतिज्ञ,
वैज्ञानिक, लेखक, शिक्षक, चिकित्सक,
इंजीनियर या मजदूर
कुछ भी बने
आखिर राष्ट्र निर्माण
का भवन इन्हीं
की नींव पर
खड़ा होता है।
पं.
नेहरू प्रौढ़ और
युवाओं की तुलना
में ज्यादा स्नेह
और महत्व बच्चों
को दिया करते
थे। इसी भावना
को समझते हुए
समाज ने उन्हें
चाचा नेहरू की
उपाधि से विभूषित
किया। इसलिए आज
भी 14 नवंबर का
दिन बाल दिवस
के रूप में
मनाया जाता है।
पं. नेहरू यूं तो
सारे जहान के
गुण अपने अंतर्मन
में समेटे हुए
थे, राष्ट्र निर्माण
की भावना, विश्व
बंधुत्व की लालसा,
अहिंसा एवं समाजवाद
की अविरल धारा
बहाने का भी
उन्होंने पुरजोर प्रयास किया
था।
सदियों
की गुलामी के
बाद जब देश
कोआजादी मिली तो
आजादी के प्रथम
दिन से ही
देश की बागडोर
अपने कर्मठ हाथों
में संभाल ली।
उनके राजनीतिक हाथ
इतने मजबूत और
सशक्त थे कि
भारतीय जनता ने
उनकी शासन करने
की क्षमता को
सराहा और पसंद
किया। सत्तारूपी देवी
ने उनसे प्रधानमंत्री
की कुर्सी कभी
नहीं छीनी, बल्कि
जिंदगी ने ही
उनका दामन छोड़
दिया। वे 13 वर्ष
की उम्र में
ही थियोसॉफिकल सोसायटी
के सदस्य बने।
15 वर्ष की उम्र
में पंडितजी ने
हेरो स्कूल और
ट्रिनिटी कॉलेज में अपनी
शिक्षा पूर्ण की।
चौदह
नवंबर बाल दिवस
के रूप में
मनाने का औचित्य
यह है कि
पं. जवाहरलाल नेहरू
बच्चों को देश
का भविष्य मानते
थे। उनकी यह
अवधारणा सौ फीसदी
सत्य है, क्योंकि
आज जन्मा शिशु
भविष्य में राजनीतिज्ञ,
वैज्ञानिक, लेखक, शिक्षक, चिकित्सक,
इंजीनियर कुछ भी
बन सकता है।
वहां
से लौटकर सन्
1918 में उन्हें होनरूल लीग
का सचिव चुन
लिया गया। कुछ
समय बाद ही
उन्हें इंडियन नेशनल कांग्रेस
का अध्यक्ष बना
दिया गया। इस
स्वर्णकाल में उन्होंने
देश में पंचवर्षीय
योजनाओं को क्रियान्वित
करवाकर जनमानस को राजनीतिक,
सांस्कृतिक और आर्थिक
ठहराव के दलदल
से बाहर निकाला
और देश की
तरक्की के नए
आयाम स्थापित किए।
उन्होंने
देश से बाहर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर
भारत की पताका
फहराने में महत्वपूर्ण
भूमिका अदा की।
उन्होंने उपनिवेशवाद, नव उपनिवेशवाद,
साम्राज्यवाद, रंगभेद और अन्य
कई प्रकार के
भेदभावों को दूर
करने के लिए
विश्व के तमाम
देशों को औपनिवेशिक
शासन से मुक्त
कराने का श्रेय
प्राप्त किया।
पंचशील
सिद्धांतों को लागू
करवाकर विश्व के देशों
में शांति और
सद्भावना स्थापित करने में
उनका अपूर्व योगदान
था। नेहरूजी राजनीतिक,
समाजिक एवं आर्थिक
चिंतक होने के
अतिरिक्त एक उच्चकोटि
के लेखक थे,
जिन्होंने दो पुस्तकें
(1) डिस्कवरी ऑफ इंडिया
और (2) ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड
हिस्ट्री लिखी, जो कि
विश्व प्रसिद्ध हैं।
पं. नेहरू बच्चों
के प्रिय चाचा
होने के साथ-साथ एक
सफल राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री,
चिंतक-साहित्यकार थे। (सतीश उदैनिया)

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