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नारी "शक्ति" की खान


आज की नारी स्वयं को पहचाने अपनी आतंरिक शक्तियों को उभारे और उन्हें रचनात्मक कार्यो में लगा दे तो विकास की गति कई गुना बढ़ सकती है ये शक्ति है, वह जहॉ पर लगेगी, अपना परिचय देगी।  उसे स्वयं में पवित्रता और साहस, शौर्य फिर बढ़ाना होगा, जिससे कि उसे भोग्या के रूप में न देखा जा सके। यदि वह अपने स्वरूप को पहचान सकेगी तो वह आज के अश्लील एवं मॉडलिंग के मार्केट में बिकने से बच सकेगी।


नारी के विषय में ऋग्वेद में ऋषि उद्धोष करते हैं -
शुचिभ्राजा, उपसो नवेदा यशस्वतीर पस्युतो न सत्या:।
अर्थात
"श्रध्दा, प्रेम, भक्ति, सेवा, समानता की प्रतीक नारी पवित्र, निष्कलंक, आचार के प्रकाश से सुशोभित, प्रात:काल के समान ह्नदय को पवित्र करने वाली, लौकिक, कुटिलता से अनभिज्ञ, निष्पाप, उत्तम, यशमुक्त, नित्य, उत्तम कार्य की इच्छा करने वाली, संकर्मण्य और सत्य व्यवहार करने वाली देवी है।"
प्रकृति ने नारी को कुछ विशेष अंलकारों से विभूषित किया है, पुरुषों की तुलना में नारियों में कई गुण एवं विशेषतायें अधिक होती है। पुरुष भले ही बल और साहस के क्षेत्र में आगे होते है, पर नारी संवेदनाओं और भावनाओं के प्रति अत्यन्त सुग्राही होती है। प्रकृति ने ये गुण उसे नैसर्गिक रूप से प्रदान किये है। इतनी सारी दिव्य क्षमताओं से भरपूर नारी अबला दोयम दर्जे की नहीं हो समकती, हाँ, यह जरूर है कि उसके अपने विकास में पुरुषों के भाव भरे सहयोग की आवश्यकता पड़ती है।


नारी के विकास एवं उसे स्थापित करने के लिये जितने आंदोलन हुये, उनकी आंशिक सफलता के पीछे नारी का जटिल एवं व्यापक बहुपंथी होना है, जब तक इसकी समग्र समस्या पर ध्यान नहीं दिया जायेगा, तब तक उनके समग्र विकास की परिकल्पना पूर्ण नहीं हो सकती है। इस दिशा में विचार क्रान्ति के बैनर तले महिला जागृति आंदोलन की भूमिका एवं कार्य महत्वपूर्ण है। अब फिर इस उपेक्षित आधी जनसंख्या से ऐसा महत्व और श्रेय मिलने जा रहा है, जिसकी वह अधिकारिणी तो आदिकाल से पर उसके वैभव का किसी दुर्भाग्य दैत्य ने अपहरण कर लिया था। अब वह उसे नए सिरे से, नए रूप में प्राप्त होने जा रहा है। उसे शक्ति, समर्थता और साहसिकता के वे बल-बैभव फिर से प्राप्त होने जा रहे है। जिससे वह अपनी सत्ता की महत्ता भली प्रकार व प्रमाणित कर सके।
आज संसार भर में  नारी उत्थान की दिशा में कुछ ऐसा अभूतपूर्व परिवर्तन होने जा रहा है जिससे समूची मानवता अपने समूचे कलेवर के साथ विकसित परिष्कृत होने का सुयोग मिल सके। आज संसार में अनेक क्षेत्रों में नारियॉ अपने-अपने प्रयोजनों में कार्यरत है, जिनमें शिक्षा, संस्कृति, कला संपदा, प्रतिभा, कॉरपोरेट, मीड़िया को प्रमुख माना जाता है। अब वह इन सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व सिध्द करने जा रही है। भविष्यवक्ता नारियों पर अपने अनुदानों की वर्षा करने पर उतारू है, अब न सिर्फ नारी के भाग्य में स्वत: ही बेड़ियों से मुक्ति लिख दी गयी है, वरन विधाता ने उसे मुक्तिदूत बनने का गरिमापूर्ण दायित्व भी सोंपा है। यह अपने युग का सुनिश्चित निर्धारण है, जो इन्हीं दिनों पूरा होने वाला है।
भारतीय महिलाओं ने सूझ-बूझ एवं पुरुषार्थ का परचम केवल अपने देश में ही नहीं लहराया है, बल्कि परदेश में भी इन्होंने अपनी साहस भरी सफलता का स्वर बुंलद किया है। 
विश्व विजेता संतति हो, कौन टक्कर लेगा
खोलो नेत्र तीसरा, कालकूट धू-धू जल उठेगा
उठो नारी  ! अब दुष्कर्मीयों को धूल चटा दो
देश-द्रोहियों को दे सजा, नर्क तक पहुँचा दो।


स्वाति"सरू"जैसलमेरियालेखिका जोधपुर

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