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अग्रसेन जयंति पर विशेष समाजवाद के प्रणेता महाजा अग्रसेन

 abslm 26/9/2022 -अशोक बुवानीवाला


अग्रकुल प्रवर्तक, समाजवाद के प्रणेता, वैश्य शिरोमणी, अहिंसा के पुजारी, शांतिदूत महाराजा अग्रसेन का जन्म प्रतापनगर के राजा बल्लभ के यहां अश्विनी शुल्क प्रतिपक्ष को लगभग 5176 वर्ष पूर्व हुआ था। वे उनके सबसे बड़े पुत्र थे। इसी खुशी में महाराजा बल्लभ ने यमुना नदी के किनारे एक नए नगर की स्थापना की, जिसका नाम अग्रपुर रखा गया, जो बाद में आगरा नाम से प्रसिद्ध हआ। अग्रसेन का लालन-पालन बड़े लाड़-चाव के वातावरण में हुआ। वे बचपन से ही बड़े प्रतिभाशाली थे। बड़े होने पर प्राचीन शिक्षा प्रणाली के अनुसार उनकी शिक्षा का प्रबंध किया गया। अग्रसेन ने बचपन में ही वेद शास्त्र, अस्त्र शास्त्र, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। वे सभी विद्याओं में पारंगत थे।




सब प्रकार से सुयोग्य होने पर महाराजा अग्रसेन का विवाह हुआ। एक समय नागलोक से नागों का राजा कुमुद अपनी कन्या माधवी को लेकर भूलोक में आया। इन्द्र ने उसे चाहा और उसने नागराज से वह कन्या मांगी, परन्तु नागराज ने सब प्रकार से अग्रसेन को सुयोग्य जानकर उसका विवाह अग्रसेन से कर दिया। महाराजा अग्रसेन का विवाह एक महान वैभवशाली नागवंश में अत्यंत ही रूपवान, गुणशील कन्या के साथ हुआ। इस वैवाहिक संबंध के कारण महाराजा अग्रसेन और देवराज इंद्र के मध्य शत्रुता हो गई। यह विवाह दो संस्कृतियों का मिलन था। अग्रसेन सूर्यवंशी और माधवी नागवंशी थे। इस पर महाराजा अग्रसेन ने इन्द्र पर चढ़ाई कर दी। महाराजा अग्रसेन के पास जो नैतिक बल था, उसके सामने इंद्र की सेना टिक नहीं पाई और वह घबराकर युद्ध से भाग गया। ऐसी अवस्था में इन्द्र ने देवर्षि नारद को महाराजा अग्रसेन के पास संधि करने भेजा। नारद जी ने महाराजा अग्रसेन और इन्द्र के बीच संधि करवाई। इस बीच अग्रसेन के मन में अनेक विचार पैदा हुए। उनके मन में यह विचार सबसे अधिक उथल-पुथल मचा रहा था कि इन झगड़ों से हमेशा के लिए कैसे बचा जाए। उन्होंने काशी जाकर भगवान शिव की आराधना प्रारम्भ की। उनकी कठिन तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शंकर ने दर्शन दिए। भगवान शंकर के आदेशानुसार महाराजा अग्रसेन ने महालक्ष्मी की आराधना प्रारम्भ की। महालक्ष्मी ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी तपस्या से प्रभावित होकर महाप्रतापी होने का आशिर्वाद दिया। साथ ही महालक्ष्मी ने यह भी कहा कि वे क्षत्रिय वर्ण त्याग कर वैश्य वर्ण अपनाएं। महालक्ष्मी ने उन्हें आशिर्वाद दिया और कहा कि वे हमेशा उनके वंशजों के साथ रहेगी। महालक्ष्मी ने अग्रसेन को यह भी कहा कि वे अपना अलग राज्य स्थापित करें। महालक्ष्मी के आशिर्वाद का कवच पहनकर अग्रसेन ने पूरे भारत की यात्रा की। एक बार वे यात्रा कर रहें थे। इस यात्रा में एक स्थान पर उन्होंने देखा कि एक सिंहनी प्रसव कर रही थी, अग्रसेन जी के लाव-लश्कर से उसके प्रसव में बाधा पडी। सिंह के क्रुद्ध बच्चे ने जन्म लेते ही राजा के हाथी पर प्रहार किया और अकल्पनातीत शौर्य को प्रदर्शित किया। यह देखकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। महारानी माधवी और अग्रसेन ने सोचा यह भूमिवीर प्रसूता है। उन्होंने वही पर अपना नया राज्य बनाने का निश्चय किया। वहां पर बसाये गए नये नगर का नाम ही अग्रोहा रखा गया। अग्रोहा के सुनियोजित विकास से अग्रोहा की तरफ लोगों का आकर्षण बढ़ा और देखते ही देखते यह राज्य का सबसे समृद्धशाली नगर बन गया। व्यापार, कृषि और उद्योग के विकास से महाराजा अग्रसेन की कीर्ति चारों और फैलने लगी। महाराजा अग्रसेन ने शासन की बागडोर संभालते ही न्याय, समानता व समय की आवश्यकता को देखते हुए निर्णय लिया कि अपने अनुज भ्राता शूरसेन जी को पृथक राज्य का शासक बनाते हुए अग्रजनपद में एक पृथक राज्य स्थापित किया। श्री शूरसेन को समान अधिकार प्रदान करते हुए राजा के पद से सुशोभित किया गया तथा उनकी राजधानी वर्तमान आगरा (अग्रनगर) शहर को बनाया। महाराजा ने 18 यज्ञ आयोजित किए। उस युग में यज्ञ करना और उसमें सफलता प्राप्त करना, सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता था। एक यज्ञ के समय महाराजा अग्रसेन ने देखा कि बलि के लिए लाए जा रहे घोड़े बलि स्थान की ओर बढऩे की बजाय पीछे हटना चाह रहें थे। महाराजा अग्रसेन के मन में घोडों के प्रति करूणा का भाव पैदा हुआ और उन्होंने सोचा कि इन मूक पशुओं की बलि से क्या मेरा कल्याण हो सकता है। इस भावना से उनके मन में अहिंसा का एक तुफान उठा और उन्होंने अपने मंत्रिमंडल से इस बारें में विचार-विमर्श किया अधिकत्तर लोगों का मानना था कि हिंसा बंद कराने से पड़ोसी राज्यों पर असर पड़ेगा और वो कहीं अग्रोहा पर हमला नहीं कर बैठें। इस पर महाराजा अग्रसेन ने कहा कि समाज में व्याप्त विषमता को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे। लेकिन हिंसा बंद करवाने का यह अर्थ नहीं कि हम अपने राज्य की भी रक्षा नहीं कर सकेंगे। उस यज्ञ में उन्होंने पशु बलि नहीं दी और अपने राज्य में हिंसा रोकने का आदेश दिया। साथ ही यह व्यवस्था दी कि अग्रोहा में से नए साधनहीन प्रत्येक व्यक्ति को अग्रोहावासियों द्वारा एक रूपया और एक ईंट भेंट स्वरूप दी जाएगी। ताकि नवांगुतक अपना घर बसाकर उदर-पूर्ति हेतू व्यवस्था कर उपार्जन कर सकें। इस प्रकार का साम्यवाद व विश्वबंधुत्व का सही तथा प्रत्यक्ष उदाहरण सर्वप्रथम महाराज श्री अग्रसेन जी ने ही प्रतिपादीत किया। यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि महाराज अग्रसेन विश्व में सहकारिता एवं समाजवाद के प्रणेता एवं जनक थे। अग्रोहा राज्य को 18 जनपदों में विभाजित कर अपने पुत्रों को एक-एक जनपद का अधिशाषी बनाया। यज्ञों को 18 राजकुमारों के साथ बैठे गुरूओं के नाम पर गोत्रों की स्थापना की। यही गोत्र आज अग्रवंश को गीता के 18 अध्याय की भांति अलग-अलग होकर भी एक-दूसरे से जुड़े हुए है। इस व्यवस्था से अग्रोहा का चहुंमुखी विकास हुआ। अपने जीवन के उत्तरार्ध में 133 वर्ष की आयु में (कलयुग सम्वत् 108) महाराजा अग्रसेन ने अपने बड़े पुत्र को राजगद्दी सौंपकर स्वयं वानप्रस्थ को चले गए और 193 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गए। लेखक अग्रवाल वैश्य समाज के अध्यक्ष भी है।

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