AABSLM

हमारी साइट में अपने समाचार सबमिट के लिए संपर्क करें

मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन सुख शांति से व्यतीत कर सकता है परंतु प्रकृति के कुछ नियम भी है जिनका सही पालन ना करने पर प्रकृति प्रकोप करती है और जिसका दुष्परिणाम सभी को भुगतना पड़ता है

 क्यूं होते है प्राकृतिक प्रकोप 


बलदेव चौधरी क्राइम ब्यूरो चीफ अलवर

ABSLM 9/1/2024

                                                                                                                     

प्रकृति ने मनुष्य के लिए सब कुछ उत्पन किया जिसका उपयोग करते हुए मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन सुख शांति से व्यतीत कर सकता है परंतु प्रकृति के कुछ नियम भी है जिनका सही पालन ना करने पर प्रकृति प्रकोप करती है और जिसका दुष्परिणाम सभी को भुगतना पड़ता है

प्रकृति के नियमो में एक महत्वपूर्ण नियम है आदान प्रदान,जिसका सही उपयोग सभी को करना चाहिए प्रकृति में पेड़ पौधे है जिनसे मनुष्य के जीवन की भोजन से लेकर घर और वस्त्र के अलावा सभी अवध्यकताओं की पूर्ति होती है लेकिन स्वार्थी मनुष्य पेड़ पौधे अपने स्वार्थ के लिए दिन रात काट तो रहा है परंतु बदले में नए पेड़ पौधे लगा नही रहा परिणाम आदान प्रदान का नियम भंग हो गया किसी जलाशय में जल का आदान प्रदान नही हो रहा तो वह पानी सड़ जाएगा उसमे कीड़े पड़ जायेंगे और वह जल उपयोग के योग्य है रहेगा,कोई मनुष्य किसी से पैसे उधार लेकर वापस नही लोटाये तो क्या होगा आदान प्रदान का नियम रूक जाएगा या कोई मनुष्य पेट में भोजन पानी का आदान yani खाता पीता ही जा रहा है प्रदान यानी मलमूत्र का त्याग नहीं हो रहा है परिणाम बीमार पड़ जायेगा आदान प्रदान का नियम रूक गया,सब कुछ आदान प्रदान के नियम पर निर्भर है यदि ये नियम किसी भी प्रकार से बिगड़ता है तो प्रकृति प्रकोप करती है,प्रकृति का दूसरा नियम है परिवर्तन अगर परिवर्तन रुक जाए तो क्या होगा,मनुष्य जीवन से लेकर सभी प्राकृतिक वस्तुओ में परिवर्तन हर पल अनिवार्य है एक बच्चा पैदा होकर धीरे धीरे बड़ा होता है और बचपन से युवा फिर वृद्ध अवस्था से अंत को प्राप्त होता है अगर ये परिवर्तन रुक जाए तो,यानी हर तरह से परिवर्तन बहुत ही महत्वपूर्ण है चाहे वो मनुष्य के जीवन का हो या किसी पद या सत्ता का अगर सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ तो तानाशाही और मनमानी बड़ जायेगी जिसका परिणाम सब जानते है,उसी प्रकार सुख दुःख का भी जोड़ा है अगर सुख के बाद दुःख ना हो हो सुख की महत्ता क्या रह जायेगी,अगर दिन के बाद रात और रात के बाद दिन परिवर्तन नहीं हो तो परिणाम क्या होगा सब कुछ नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा,कहने का अर्थ ये है जब हम प्राकृतिक साधनों को नष्ट करके कृत्रिम संसाधन का उपयोग पर बहुत ही ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं जिसके परिणाम स्वरूप प्रकृति के नियमो का उलंघन होने से प्रकृति प्रकोप करती हैं जिससे अनावृष्टि ओलावृष्टि अतिवृष्टि ,और भयंकर भूकंप उल्कापत और भयंकर महामारी ये सब प्रकृति के नियमो का सही पालन ना करने का ही परिणाम है आज जो कुछ भी संकट पैदा हो रहे हैं वो मनुष्य अपने संकीर्ण मानसिकता और द्वेष भावना से ग्रसित हो कर प्राकृतिक नियमो का उलंघन करके कष्ट मय जीवन भोग रहा है जिसका उतरदादयी वह स्वयं ही है और कोई नहीं,

निवेदन :- अगर आपको लगता है की ये लेख किसी के लिए उपयोगी हो सकता है तो आप निसंकोच इसे अपने मित्रो को प्रेषित कर सकते है