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एक आम औरत की कहानी

ABSLM     8/3/2024   


  छोटी थी जब मै,बहुत ज्यादा बोलती थी ,

 माँ हमेशा झिडकती ,

 चुप रहो ! बच्चे ज्यादा नहीं बोलते।

 थोड़ी बड़ी हुई जब मै,थोड़ा ज्यादा बोलने पर 

 माँ फटकार लगाती ,

 चुप रहो ! बड़ी हों रही हों .

जवान हुई जब मै,

थोड़ा भी बोलने पर

 माँ जोर से डपटती

 चुप रहो,दूसरे के घर जाना है .

  ससुराल गई जब मै ,

 कु़छ भी बोलने पर

  सास ने ताने कसे ,

  चु प रहो, ये तुम्हारा मायका नहीं

  गृहस्थी संभाला जब मैने , 

  पति की किसी बात पर बोलने पर उनकी डांट मिली, चुप रहो ! तुम जानती ही क्या हों ?

  नौकरी पर गई मैं, सही बात बोलने पर कहा गया,चुप रहो !

अगर काम करना है तो

थोड़ी उम्र ढली जब ,अब जब भी बोली तो

   बच्चों ने कहा ,चुप रहो !

तुम्हें इन बातों से क्या लेना

  बूढ़ी हों गई जब मैं, 

   कुछ भी बोलना चाहा तो सबने कहा

  चुप रहो !तुम्हें अब आराम की जरूरत है।

  इन चुप्पी की तहों में ,आत्मा की गहराईयों में

  बहुत कुछ दबा पड़ा है ..

  उन्हें खोलना चाहती हूँ मै,बहुत कुछ बोलना चाहती हूँ मैं

 पर सामने यमराज खड़ा है ,कहा उसने चुप रहो!तुम्हारा अंत आ गया है,और मैं चुपचाप चुप हो गई ' हमेशा के लिए... सदा के लिए -- सर्वदा के लिए ।

यत्र नारीस्तु: पुज्ययतें:  तत्र रमन्यते देवता।

  अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस 

 पर विशेष आलेख 

"प्रियश्री " विनोद तकियावाला

स्वतंत्र पत्रकार / स्तम्भकार 

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